कबीर के दोहे – 1

Last updated on Nov 21, 2011

Posted on Nov 21, 2011

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This is the first post on Sant Kabir’s verses – called Dohe.  I will bring more of these everyday.

बिरछा कबहूँ न फल भखै, नदी न अन्चवे नीर
परमार्थ के कारने, साधू धरा शरीर|

वृक्ष कभी भी अपना फल खुद नहीं खाता, न ही नदी कभी अपना जल पीती है|  उसी प्रकार साधू संतों का जीवन दूसरों के परमार्थ और परोपकार के लिए ही होता है|

आँखों देखा घी भला, ना मुख मेला तेल ,
साधू सों झगडा भला, न साकट सों मेल

आँखों से देखा हुआ घी का दर्शन मात्र भी अच्छा होता है|  परन्तु, मुख में डाला हुआ तेल भी अच्छा नहीं होता|  ठीक वैसे ही, साधू जन से झगडा भी कर लेना अच्छा है|  किन्तु, बुद्धि-हीन मनुष्यों से मिलना भी अनुचित होता है|

आब गया, आदर गया, नैनं गया स्नेह,
यह तीनों तब ही गए, जबहीं कहा कछु देह|

समाज में प्रतिष्ठा जाते ही, सबकी दृष्टि से आपके लिए आदर चला जाता है और उनके नैनों में (और ह्रदय में) प्रेम एवं स्नेह|  पर यह तीनों – प्रथिष्ठ्ता, आदर और स्नेह – तब जातें हैं, जब आप किसी पर बोझ बन जाते हो|

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